ज्ञान · साधना · जीवन
शाश्वत ज्ञान,
सरल शब्दों में।
सनातन ज्ञान की उस धारा से जुड़िए जो सदियों से हमें भीतर की शांति और जीवन का सही मार्ग दिखाती आई है।
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योगः कर्मसु कौशलम्
कर्म में कुशलता ही योग है।
श्रीमद्भगवद्गीता २.५०
यह स्थल क्यों बना
बहुत से पाठक गीता का एक श्लोक सोशल मीडिया पर देखकर रुक जाते हैं। अर्थ अधूरा रह जाता है, और अगला श्लोक संदर्भ के बिना अटक जाता है। सनातन ज्ञान उसी अंतर को भरने के लिए है — अध्याय के साथ पढ़ना, देवता को केवल चित्र नहीं समझना, और त्योहार को कैलेंडर की तारीख से आगे की कथा तक ले जाना।
हम पूरा ग्रंथ एक रात में खत्म करने को नहीं कहते। एक अध्याय की कुंजी पढ़ें, दो श्लोक मनन करें, और यदि कोई पर्व निकट हो तो उसकी रीति घर की भाषा में जान लें। ज्ञान तब स्थिर होता है जब वह रोज के काम से जुड़ता है।
तीन धाराएँ
गीता ज्ञान में अठारह अध्याय क्रम से हैं। प्रत्येक अध्याय पर मूल सार के साथ हमारी पढ़ने की कुंजी है — ध्यान देने योग्य बात, और एक छोटा अभ्यास। चुने हुए श्लोकों पर भावार्थ और जीवन का उदाहरण अलग से लिखा गया है।
देवता खंड त्रिमूर्ति से अवतारों तक संबंध दिखाता है, ताकि नाम अकेले न रह जाएँ। त्योहार खंड कथा, कारण, रीति और क्षेत्र जोड़ता है, और कैलेंडर आगामी तिथियाँ देता है।
कैसे शुरू करें
यदि आप नए हैं तो दूसरे अध्याय से शुरू करें — वहीं गीता का बीज है। यदि कोई पर्व निकट है तो पहले उसकी कथा पढ़ें। यदि किसी देवता का नाम घर में नित्य लिया जाता है, तो उसी पृष्ठ से संबंधों का जाल खोलें।
प्रसिद्ध श्लोक
चुने हुए श्लोक — भावार्थ के साथ
ये वे श्लोक हैं जिन पर हमने अपनी व्याख्या लिखी है। पूरा अध्याय पढ़ने के लिए गीता ज्ञान खोलें।
अध्याय 2 · श्लोक ४७
कर्मण्येवाधिकारस्ते
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं।
श्लोक पढ़ें →अध्याय 6 · श्लोक ०५
उद्धरेदात्मनात्मानं
मनुष्य को अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं।
श्लोक पढ़ें →अध्याय 4 · श्लोक ०७
यदा यदा हि धर्मस्य
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं प्रकट होता हूँ।
श्लोक पढ़ें →