परिचय
ॐ हं हनुमते नमः
हनुमान जयंती अंजना और केसरी के पुत्र, वायुपुत्र हनुमान का जन्मोत्सव है। उत्तर भारत में यह चैत्र पूर्णिमा को मनाई जाती है, और यह दिन बल के साथ विनम्रता तथा भक्ति के साथ सेवा का स्मरण कराता है।
उत्पत्ति
हनुमान का चरित्र वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा, सुंदर और युद्ध कांड में विस्तार से आता है, और शिव पुराण उन्हें शिव का अंश या ग्यारहवाँ रुद्रावतार कहता है। तुलसीदास रचित हनुमान चालीसा ने इस उपासना को घर-घर पहुँचाया। जन्मस्थान की परंपराएँ अलग हैं — महाराष्ट्र में नासिक के निकट अंजनेरी पर्वत और कर्नाटक में किष्किंधा के अंजनाद्रि को जन्मभूमि माना जाता है, और तमिलनाडु तथा केरल में यह पर्व मार्गशीर्ष या धनु मास में मनाया जाता है।
क्यों मनाया जाता है
हनुमान की उपासना का कारण यह है कि वे शक्ति और शील का दुर्लभ संयोग हैं। असीम बल होते हुए भी वे कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहते; उनका सारा पराक्रम राम के कार्य के लिए है। भक्त उन्हें संकटमोचन मानते हैं और भय, आलस्य तथा आत्म-संदेह से मुक्ति के लिए पुकारते हैं। मंगलवार और शनिवार उनके दिन हैं, और चालीसा का पाठ साहस का सबसे लोकप्रिय अभ्यास है। उनका जीवन सिखाता है कि सेवा में लगी शक्ति ही सार्थक है।
कथा
अप्सरा पुंजिकस्थला शाप के कारण वानरी अंजना बनीं और केसरी की पत्नी हुईं। संतान के लिए उन्होंने वर्षों शिव की आराधना की। उसी काल में अयोध्या में दशरथ का पुत्रकामेष्टि यज्ञ हुआ; उस दिव्य खीर का एक अंश वायु देव पवन के वेग से उठाकर तपस्या में लीन अंजना के हाथों तक पहुँचा दिया। उस प्रसाद को ग्रहण करने से चैत्र पूर्णिमा को हनुमान का जन्म हुआ — शिव का अंश, वायु का पुत्र और राम का भावी सेवक। बालक हनुमान ने भूख लगने पर उगते सूर्य को फल समझकर निगलने के लिए उड़ान भरी; इंद्र ने वज्र से प्रहार किया जिससे उनकी ठुड्डी टूट गई और वे मूर्छित हो गए — इसी से "हनुमान" नाम पड़ा। क्रोधित वायु ने सृष्टि की श्वास रोक दी, तब ब्रह्मा सहित सभी देवताओं ने आकर उन्हें जीवित किया और अस्त्र-अभेद्यता, अपार बल तथा इच्छानुसार रूप बदलने के वरदान दिए।
कहानियाँ और प्रसंग
हनुमान की कथाएँ भक्ति से उत्पन्न सामर्थ्य की कथाएँ हैं। लंका में सीता को खोजना और अशोक वाटिका में राम की मुद्रिका देना; जामवंत के स्मरण कराने पर अपनी विस्मृत शक्ति को पहचानना; युद्ध में लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए संजीवनी सहित पूरा द्रोणगिरि पर्वत उठा लाना; सूर्य को बगल में दबाकर रात रोक देना; अहिरावण के वध में पंचमुखी रूप धारण करना — और सीता से मिली मोतियों की माला को यह कहकर तोड़ देना कि जिसमें राम का नाम नहीं, उसका क्या मूल्य। महाभारत में भीम को अपनी पूँछ न उठा पाने पर अभिमान का पाठ पढ़ाने वाले वृद्ध वानर भी वही हैं। मान्यता है कि वे आज भी चिरंजीवी हैं और जहाँ राम कथा होती है, वहाँ सूक्ष्म रूप में उपस्थित रहते हैं।
विधि एवं परंपरा
प्रातः स्नान के बाद हनुमान चालीसा, सुंदरकांड और बजरंग बाण का पाठ; सिंदूर और चमेली के तेल का चोला; लाल पुष्प, पान और गुड़-चने का अर्पण; बूंदी के लड्डू का भोग और भंडारा; मंदिर में ध्वजा और शोभायात्रा।
कहाँ मनाया जाता है
सम्पूर्ण भारत — उत्तर भारत में चैत्र पूर्णिमा, महाराष्ट्र में चैत्र पूर्णिमा प्रातः, तमिलनाडु और केरल में मार्गशीर्ष अमावस्या; सालासर, मेहंदीपुर और हनुमानगढ़ी में विशाल आयोजन।

