परिचय
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
नवरात्रि देवी शक्ति के नौ रूपों की उपासना की नौ रातें हैं। प्रत्येक दिन नवदुर्गा का एक स्वरूप पूजित होता है, और दसवें दिन विजयादशमी के रूप में असत्य पर सत्य की विजय मनाई जाती है।
उत्पत्ति
नवरात्रि का शास्त्रीय आधार मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत देवी माहात्म्य या दुर्गा सप्तशती है, जिसमें देवी के तीन चरित्र और महिषासुर, शुंभ-निशुंभ तथा रक्तबीज के वध का वर्णन है। वर्ष में चार नवरात्रि होती हैं — चैत्र, आश्विन और दो गुप्त नवरात्रि — पर शारदीय नवरात्रि सबसे प्रसिद्ध है। मान्यता है कि रावण से युद्ध के पूर्व राम ने असमय में देवी का आह्वान किया, जिसे अकाल बोधन कहा गया, और तभी से शरद ऋतु की यह उपासना प्रचलित हुई।
क्यों मनाया जाता है
नवरात्रि का भाव यह है कि सृष्टि की मूल ऊर्जा शक्ति है, और वही रक्षा तथा संहार दोनों करती है। नौ दिन का व्रत, संयम और जागरण भीतर के तमस को क्षीण करने की साधना है — पहले तीन दिन दुर्गा के रूप में अशुद्धि का नाश, अगले तीन लक्ष्मी के रूप में सद्गुण की वृद्धि, और अंतिम तीन सरस्वती के रूप में ज्ञान की प्राप्ति। कन्या पूजन इस विश्वास का व्यावहारिक रूप है कि देवी हर स्त्री में विद्यमान हैं। यह ऋतु संधि का काल भी है, जब उपवास शरीर को शुद्ध करता है।
कथा
महिषासुर ने ब्रह्मा से यह वरदान पा लिया था कि कोई देव या पुरुष उसका वध न कर सके। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवता निर्वासित हो गए। तब ब्रह्मा, विष्णु, शिव सहित सभी देवों के तेज एकत्र हुए और उससे अठारह भुजाओं वाली, सिंह पर आरूढ़, आयुधों से सज्जित दुर्गा प्रकट हुईं — प्रत्येक देव ने अपना अस्त्र उन्हें दिया। नौ दिन तक भीषण युद्ध चला; महिषासुर बार-बार रूप बदलता रहा — सिंह, हाथी, मनुष्य और अंत में भैंसा। दसवें दिन देवी ने उसका मस्तक त्रिशूल से भेद दिया और महिषासुरमर्दिनी कहलाईं। इस कथा का भाव है कि जब कोई शक्ति अकेली अपर्याप्त हो, तब समवेत तेज ही अधर्म का अंत करता है।
कहानियाँ और प्रसंग
दुर्गा सप्तशती में शुंभ-निशुंभ की कथा है, जिनके सेनापति रक्तबीज का रक्त भूमि पर गिरते ही उसके प्रतिरूप उत्पन्न होते थे; तब देवी ने काली का रूप धरकर उसका रक्त भूमि पर गिरने से पहले पी लिया — अर्थात् अहंकार को उसके स्रोत पर ही रोकना होता है। नवदुर्गा के नौ नाम — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री — साधना की नौ सीढ़ियाँ मानी जाती हैं। सती के देह त्याग और शिव के तांडव की कथा से इक्यावन शक्तिपीठों की परंपरा जुड़ी है, जहाँ नवरात्रि में विशाल मेले लगते हैं। गुजरात में गरबा और डांडिया देवी के चारों ओर जीवन के नृत्य का प्रतीक हैं, बंगाल में दुर्गा पूजा में देवी मायके आती हैं, और उत्तर भारत में रामलीला के मंचन के साथ यह नौ दिन बीतते हैं।
विधि एवं परंपरा
कलश स्थापना और अखंड ज्योति; जौ बोना और नौ दिन उसकी सिंचाई; फलाहार या सात्विक व्रत; दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा और ललिता सहस्रनाम का पाठ; प्रतिदिन एक स्वरूप का पूजन और रंग धारण; अष्टमी-नवमी को कन्या पूजन, हवन और पूरी-चना-हलवा का प्रसाद; गरबा, डांडिया और दुर्गा पूजा पंडाल।
कहाँ मनाया जाता है
सम्पूर्ण भारत — बंगाल, असम और ओडिशा में दुर्गा पूजा; गुजरात में गरबा; उत्तर भारत में व्रत और रामलीला; कर्नाटक तथा तमिलनाडु में बोम्मई गोलू और मैसूर दसरा।

