
अध्याय 6 · ध्यान योग · ०५
उद्धरेदात्मनात्मानं
श्लोक का मनन
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
लिप्यंतरण
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
इस श्लोक पर मनन
ध्यान योग का 5वाँ श्लोक «uddharet — elevate» पर टिका है। मनुष्य को अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं। अंत का पद «ātmānam — the self» मनन का सहारा बनता है।
सरल अर्थ
मनुष्य को अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं।
टीका: Swami Ramsukhdasदूसरी टीका
।।6.5।। मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।
टीका: Swami Tejomayanandaपदार्थ
uddharet — elevate
ātmanā — through the mind
ātmānam — the self
na — not
ātmānam — the self
avasādayet — degrade
ātmā — the mind
eva — certainly
hi — indeed
ātmanaḥ — of the self
bandhuḥ — friend
ātmā — the mind
eva — certainly
ripuḥ — enemy
ātmanaḥ — of the self
भावार्थ
हमारे विचार और आदतें ही हमारे सबसे बड़े सहायक या बाधा बनते हैं।
जीवन में उदाहरण
हर दिन थोड़े समय का ध्यान और आत्मचिंतन मन को अपना मित्र बनाता है।
क्रम में स्थान
यह श्लोक «यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।6.4।।» के बाद आता है, और इसके बाद «बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6.6।।» है। तीनों को एक साँस में पढ़ने से संवाद का ताल मिलता है।
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