Sanatan Gyan
गीता ज्ञानदेवतात्योहारकैलेंडरहमारे बारे में
Englishगीता ज्ञान
गीता ज्ञानदेवतात्योहारकैलेंडरहमारे बारे में
← अध्याय 6 · ध्यान योगगीता ज्ञान पर लौटें
उद्धरेदात्मनात्मानं
अध्याय 6 · ध्यान योग · ०५

उद्धरेदात्मनात्मानं

श्लोक का मनन

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

लिप्यंतरण

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ


इस श्लोक पर मनन

ध्यान योग का 5वाँ श्लोक «uddharet — elevate» पर टिका है। मनुष्य को अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं। अंत का पद «ātmānam — the self» मनन का सहारा बनता है।

सरल अर्थ

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं।

टीका: Swami Ramsukhdas
दूसरी टीका

।।6.5।। मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।

टीका: Swami Tejomayananda
पदार्थ

uddharet — elevate

ātmanā — through the mind

ātmānam — the self

na — not

ātmānam — the self

avasādayet — degrade

ātmā — the mind

eva — certainly

hi — indeed

ātmanaḥ — of the self

bandhuḥ — friend

ātmā — the mind

eva — certainly

ripuḥ — enemy

ātmanaḥ — of the self

भावार्थ

हमारे विचार और आदतें ही हमारे सबसे बड़े सहायक या बाधा बनते हैं।

जीवन में उदाहरण

हर दिन थोड़े समय का ध्यान और आत्मचिंतन मन को अपना मित्र बनाता है।

क्रम में स्थान

यह श्लोक «यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।6.4।।» के बाद आता है, और इसके बाद «बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6.6।।» है। तीनों को एक साँस में पढ़ने से संवाद का ताल मिलता है।

पूरा अध्याय पढ़ें ↗
← पिछला श्लोक
श्लोक 6.4
अगला श्लोक →
श्लोक 6.6
Sanatan Gyan

गीता, देवता और पर्व — सरल भाषा में, घर में पढ़े जाने लायक।

पढ़ें
गीता ज्ञानदेवतात्योहारकैलेंडर
स्थल
हमारे बारे मेंनिजता नीतिनियमसंपर्क
© 2026 Sanatan Gyanज्ञान बाँटने से बढ़ता है।