
अध्याय 4 · ज्ञान कर्म संन्यास योग · ०७
यदा यदा हि धर्मस्य
श्लोक का मनन
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
लिप्यंतरण
yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛijāmyaham
इस श्लोक पर मनन
ज्ञान कर्म संन्यास योग का 7वाँ श्लोक «yadā yadā — whenever» पर टिका है। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं प्रकट होता हूँ। अंत का पद «dharmasya — of righteousness» मनन का सहारा बनता है।
सरल अर्थ
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं प्रकट होता हूँ।
टीका: Swami Ramsukhdasदूसरी टीका
।।4.7।। हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।।
टीका: Swami Tejomayanandaपदार्थ
yadā yadā — whenever
hi — certainly
dharmasya — of righteousness
glāniḥ — decline
bhavati — is
bhārata — Arjun, descendant of Bharat
abhyutthānam — increase
adharmasya — of unrighteousness
tadā — at that time
ātmānam — self
sṛijāmi — manifest
aham — I
भावार्थ
धर्म सत्य, करुणा और संतुलन का जीवित सिद्धांत है, जो हर युग में पुनः जागृत होता है।
जीवन में उदाहरण
अन्याय के सामने सत्य बोलना अपने छोटे संसार में धर्म को जीवित रखना है।
क्रम में स्थान
यह श्लोक «अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।» के बाद आता है, और इसके बाद «परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।» है। तीनों को एक साँस में पढ़ने से संवाद का ताल मिलता है।
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